रात की तन्हाइयों में, तारों भरे आसमाँ में,
सुकूँ ओढ़े सन्नाटों में, उम्मीद के उजालों में,
इक सवाल आईना बन, मुझमें उभर आता है
मुल्क आज़ाद है, क्या मुझमें भी जागता है?
नानी के क़सीदों भरे जहाँ में हम पले थे,
नाना के कंधों पर बैठ मेले-जहाँ चले थे,
बाबा की गोद में ईमान का सबक़ मिला था,
माँ के ठंडे आँचल तले वही ख़्वाब बुना था।
दादी की कहानी में इक हिन्दोस्ताँ सुना था,
दादा के अमल में ईमान का नूर घुला था,
मज़हब चौखटों तक, दिलों में इख़्लास था,
सच किरदार था, और हर दर्द अपना था।
तब जाना—आज़ादी अपनी आवाज़ भर नहीं,
किसी ख़ामोशी की ज़ुबाँ बन जाना भी है,
अपने हिस्से का रिज़्क़ मिलना हक़ तो है,
किसी गिरती छत का सहारा बनना भी है।
वही जहाँ ढूँढ़ने, ख़्वाबों से कारवाँ भरे चले थे,
ज़िम्मेदारियों के पंख लगे, घर से निकल पड़े थे,
देहरी की मिट्टी चूमी तो माँ की आँख भर आई,
ख़ामोश होंठों से ही, उम्र भर की दौलत थमाई।|
भूखे की रोटी को मेहनत का मान मिले,
बेटी की बेख़ौफ़ उड़ान को पहचान मिले,
मज़लूम को आवाज़, बेबस को सहारा मिले,
हर दिल आज़ाद, आज़ादी को निगहबाँ मिले।
ईमान सलामत हो तो मुल्क का मान रहता है,
इख़्लास ज़िंदा हो तो दिल में इंसान बसता है,
अपने हक़ की ख़ातिर जीना तो आसान है,
औरों के इंसाफ़ का अलम उठाना ही किरदार है।
अपनों का वो जहाँ नक़्शों में नहीं तलाशता,
मंदिर-मस्जिद की दीवारों में ख़ुदा नहीं ढूँढ़ता,
किसी गिरते को मेरा हाथ अगर थाम ले,
बस उसी लम्हे में रूह को क़रार मिले।
माँ ने जन्म, वतन ने ज़ीस्त का मक़सद दिया,
एक ने आँचल, दूजे ने हौसलों को समंदर दिया,
कोई अपना आज, हमारे कल पे निसार कर गया,
अपनी क़ुर्बानी से आज़ादी हमारे नाम कर गया।
जो हमें अता हुआ, फ़र्दा की अमानत बन जाए,
हमसे गुज़रा हर कल और ख़ूबसूरत बन जाए,
अपनी मंज़िल की ख़ातिर किसी का हक़ न छीनना।,
आबाद रहना, मगर इख़्लास-ए-दिल न खो देना।

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